भारत सरकार मोबाइल फोन को सीधे सैटेलाइट से जोड़ने की तैयारी में है, ताकि देश के उन हिस्सों में भी कॉलिंग और इंटरनेट उपलब्ध कराया जा सके जहां मोबाइल टावर नहीं पहुंचते. दूरसंचार विभाग (DoT) ने इस नई D2D यानी डायरेक्ट-टू-डिवाइस सर्विस के लिए ट्राई से सुझाव मांगे हैं. ट्राई कीमत, नियम और तकनीकी ढांचे पर अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपेगा.
देश में 4G और 5G नेटवर्क तेजी से फैल रहा है, लेकिन पहाड़ी इलाकों, घने जंगलों और दूर बसे गांवों में ‘डार्क स्पॉट’ की समस्या बनी रहती है, जहां मोबाइल सिग्नल नहीं मिलते. सैटेलाइट के जरिए इन क्षेत्रों में कनेक्टिविटी पहुंचाना सरकार के लिए आसान और सुरक्षित विकल्प माना जा रहा है. भारत में सैटकॉम इंफ्रास्ट्रक्चर पहले से मजबूत किया जा रहा है और जल्द ही स्मार्टफोन बिना किसी अतिरिक्त डिवाइस के सीधे सैटेलाइट सिग्नल पकड़ सकेंगे.
क्या है D2D तकनीक?
रिपोर्टों के मुताबिक, D2D तकनीक स्मार्टफोन को बिना पारंपरिक नेटवर्क के सीधे सैटेलाइट से जोड़ देती है. इससे कॉलिंग और मैसेजिंग उन इलाकों में भी संभव हो जाएगी जहां मोबाइल नेटवर्क उपलब्ध नहीं है. अमेरिका में इसी मॉडल पर स्टारलिंक और टी-मोबाइल पहले ही साझेदारी कर चुके हैं. भारत में भी ऐसी सर्विस लाने की तैयारी है, लेकिन इसके लिए स्पष्ट नियम बनाना आवश्यक है.
टेलीकॉम कंपनियों ने क्यों जताई चिंता?
इसी बीच भारतीय टेलीकॉम कंपनियों ने चिंता जताई है कि अगर सैटेलाइट कंपनियां सीधे ग्राहकों को सेवा देंगी, तो इससे उनके बिजनेस पर असर पड़ेगा. कंपनियां चाहती हैं कि सैटेलाइट सर्विस प्रोवाइडर भी उन्हीं नियमों के तहत काम करें जिनका पालन टेलीकॉम कंपनियां करती हैं. इस मुद्दे पर DoT सभी पक्षों से चर्चा कर रहा है और ट्राई की सलाह में इन्हीं सुझावों को शामिल किया जाएगा.
उम्मीद है कि D2D सर्विस के लिए जरूरी ग्लोबल स्पेक्ट्रम 2027 में होने वाली ITU की WRC-27 मीटिंग में तय किया जाएगा. इसके बाद भारत सहित कई देशों में इस तकनीक का तेज विस्तार शुरू हो सकता है. सरकार इसे जल्द शुरू करना चाहती है ताकि हर कोने तक स्थायी और भरोसेमंद कनेक्टिविटी पहुंच सके, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में विकास की राह और आसान होगी.
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