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अब सिर्फ नाक से नहीं, Butt से भी ले सकेंगे सांस, जापान के वैज्ञानिकों ने खोस निकाली गजब की तरकीब

On: October 25, 2025 1:12 PM
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japan rectal oxygen trial safe breathing through butt
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अगर आपसे पूछा जाए कि आप सांस कहां से लेते हैं, तो आपका जवाब निश्चित रूप से नाक ही होगा, लेकिन क्या आप जानते हैं कि जापान के वैज्ञानिकों ने हाल ही में एक हैरान कर देने वाली खोज में मलद्वार (rectum) से सांस लेने की संभावना पर दावा किया है? जी हां, सुनने में भले ही अजीब लगे, लेकिन जापानी वैज्ञानिकों ने यह साबित किया है कि बट (rectal breathing) से ऑक्सीजन लेना संभव और सुरक्षित हो सकता है.

क्या है पूरी प्रक्रिया?

यह सुनने में मजाक जैसा लगता है, लेकिन यह एक गंभीर मेडिकल रिसर्च है. हाल ही में किए गए क्लिनिकल ट्रायल में पाया गया कि यह तरीका इंसानों के लिए सुरक्षित है. इस प्रक्रिया को एंट्रल वेंटिलेशन (Enteral Ventilation) कहा जाता है, जिसमें एक विशेष तरल पदार्थ पर्फ्लोरोकार्बन (Perfluorocarbon) को रेक्टम में डाला जाता है. यह तरल ऑक्सीजन से भरपूर होता है. वैज्ञानिकों का विचार है कि यह ऑक्सीजन आंतों की दीवारों के जरिए खून में पहुंच जाती है, जिससे व्यक्ति को नाक या मुंह से सांस लेने की जरूरत नहीं पड़ती.

किसके लिए फायदेमंद?

यह तरीका उन मरीजों के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है जिनकी श्वसन नलियां अवरुद्ध (blocked) हो गई हों. जैसे दम घुटने, चोट लगने या गंभीर फेफड़ों की बीमारी की स्थिति में. यह आइडिया पूरी तरह नया नहीं है; जानवरों पर पहले से ऐसे प्रयोग किए जा चुके हैं.

कैसे किया गया ट्रायल?

यह पहला मानव ट्रायल था, जिसका मकसद सिर्फ सुरक्षा की जांच करना था. प्रभावशीलता (Effectiveness) की जांच आगे की स्टडी में की जाएगी. जापान में हुए इस अध्ययन में 27 स्वस्थ पुरुष वॉलंटियर्स को शामिल किया गया. उन्हें ऑक्सीजन रहित तरल पदार्थ रेक्टम में दिया गया, जिसे लगभग 25 मिलीलीटर से 1500 मिलीलीटर तक की मात्रा में 60 मिनट तक होल्ड करना था. परिणामों में कोई गंभीर साइड इफेक्ट नहीं पाया गया. सिर्फ जिन प्रतिभागियों को ज्यादा मात्रा दी गई, उन्हें हल्का पेट दर्द और असुविधा महसूस हुई. बाकी सब सामान्य रहा.

क्या कहते हैं वैज्ञानिक?

ओसाका यूनिवर्सिटी के बायोमेडिकल वैज्ञानिक टाकानोरी टेकेबे का कहना है कि यह पहली बार है जब इंसानों पर इस प्रक्रिया के डेटा सामने आए हैं. उन्होंने बताया कि अब तक के नतीजे सिर्फ सुरक्षा को साबित करते हैं, न कि प्रभावशीलता को. अगला चरण उस ट्रायल का होगा, जिसमें ऑक्सीजन युक्त तरल के जरिए खून में ऑक्सीजन पहुंचाने की क्षमता को मापा जाएगा. इससे पता चलेगा कि कितनी मात्रा और कितने समय तक यह प्रक्रिया प्रभावी रहती है.

क्यों जरूरी है यह शोध?

दुनियाभर में लाखों लोग सांस से जुड़ी बीमारियों से पीड़ित हैं. कोविड-19 महामारी के दौरान करोड़ों मरीजों को ऑक्सीजन सिलेंडर की जरूरत पड़ी और कई लोग समय पर ऑक्सीजन न मिलने के कारण अपनी जान गंवा बैठे. ऐसे में यह तकनीक भविष्य में आपातकालीन बैकअप ऑप्शन बन सकती है. हालांकि अभी यह शोध अपने शुरुआती चरण में है और इसे व्यावहारिक बनाने में समय लगेगा.

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अनुष्का पांडे

लिखना मेरे लिए केवल शब्दों को जोड़ना नहीं है, बल्कि अपनी कलम से कुछ नया और महत्वपूर्ण रचना है। मैं अनुष्का पांडे, नवाबों के शहर लखनऊ की निवासी हूं। पिछले 2 सालों से मैं टेक और एंटरटेनमेंट क्षेत्र में लेखन कर रही हूं और अपने लेखों के माध्यम से पाठकों की रुचि बढ़ाना और उन्हें रचनात्मक तरीके से जानकारी प्रदान करना मेरा उद्देश्य रहा है। मैं मानती हूं कि लेखन में लोगों और सोच को बदलने की शक्ति होती है और मैं उसी दिशा में प्रयासरत एक लेखिका हूं।

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